नेपाल के असहज पड़ोसी

 

सीमा संवाददाता जीत बहादुर चौधरी की रिपोर्ट
27/08/2025

काठमाण्डौ,नेपाल – नेपाल, चीन और भारत का एक विनम्र पड़ोसी है। इसके विपरीत, नेपाल के दोनों पड़ोसी ताकत का अहंकार दिखाते हैं। नेपाल ने भारतीय मानचित्र पर सिक्किम और चीनी मानचित्र पर तिब्बत को पड़ोसी क्षेत्र मान लिया है। हालाँकि, नेपाल के दोनों पड़ोसी यह झूठा दावा करते हैं कि प्राचीन काल में उनकी वर्तमान भौगोलिक सीमाएँ समान रूप से फैली हुई थीं।

वास्तव में, आधुनिक चीन और भारत के एकीकरण का एक जटिल इतिहास है। वर्तमान चीनी जनवादी गणराज्य की स्थापना 1949 में हुए गृहयुद्ध के बाद ही हुई थी। हालाँकि भारतीय राजनीतिक विश्लेषक शशि थरूर का दावा है कि ब्रिटिश शासन से पहले, ‘वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी 23 प्रतिशत थी’, और भले ही भारत ने संसद में ‘एकीकृत भारत’ का भित्तिचित्र लगाया हो, लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि 1947 में ब्रिटेन के भारत छोड़ने से पहले भारत कभी भी एक एकीकृत संप्रभु राज्य था।

*नेपाल-ब्रिटिश युद्ध (1814-16) और सुगौली की संधि*

1816 से पहले, नेपाल की सीमाएँ पूर्व में तीस्ता नदी से सिक्किम तक और पश्चिम में सतलज नदी से किला-कांगड़ा तक फैली हुई थीं, जिसमें कुमाऊँ और गढ़वाल भी शामिल थे, जो अब भारतीय क्षेत्र होगया हैं। पीछे मुड़कर देखें तो, ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध नेपाल का युद्ध एक ‘प्रतिरोध का युद्ध’ था। हालाँकि, कुछ इतिहासकारों ने इसे एक विस्तारवादी युद्ध कहा है। नेपाल अपने एक-तिहाई क्षेत्र को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंपने के बाद भी अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने में सफल रहा।

भारत ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का उत्तराधिकारी राज्य बन गया। नेपाल सुगौली संधि से बंधा हुआ है, जो अंतर्राष्ट्रीय कानून का एक सिद्धांत है कि ‘औपनिवेशिक सीमा संधियों का सम्मान किया जाना चाहिए’। विशेष रूप से, संधि के अनुच्छेद 5 में कहा गया है कि ‘नेपाल के राजा काली नदी के पश्चिम में सभी दावों का त्याग करते हैं।’ यदि वर्तमान नेपाल भारत से अधिक शक्तिशाली होता, तो क्या भारत युद्ध में खोए हुए क्षेत्र पर कब्ज़ा बनाए रखता? इस प्रश्न का उत्तर अंतर्राष्ट्रीय कानून के बजाय राजनीति में खोजा जा सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का ग्रीनलैंड पर प्रसिद्ध दावा एक संक्षिप्त उत्तर प्रदान करता है। लेकिन राजनीतिक मुद्दे को इस लेख के दायरे से बाहर रखा गया है।

वर्तमान में, भारत सुगौली संधि से संबंधित नेपाल के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों, लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी पर अवैध रूप से कब्जा कर रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि चीन भी भारत के साथ आपसी समझौते के माध्यम से इस अवैध कब्जे में शामिल है। ऐसा त्रिकोणीय विवाद और भी जटिल होता जा रहा है। यहाँ सीमा विवाद को सुलझाने के कुछ कूटनीतिक और कानूनी विकल्पों पर चर्चा की जा रही है।

भारत और चीन ने 2014 में लिपुलेख के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद, 2015 के चीन-भारत संयुक्त वक्तव्य में, दोनों पक्ष ‘लिपु-लेक दर्रे’ व्यापार का विस्तार करने पर सहमत हुए। 2020 में गलवान घाटी में भारत-चीन सशस्त्र संघर्ष के बाद द्विपक्षीय सीमा से व्यापार निलंबित कर दिया गया था। हाल ही में, भारत और चीन 2025 में चीनी विदेश मंत्री की नई दिल्ली यात्रा के बाद लिपुलेख सीमा व्यापार को फिर से खोलने पर सहमत हुए हैं। नेपाल ने भी 2015 में नेपाल से परामर्श किए बिना नेपाल के क्षेत्र से जुड़े भारत-चीन समझौते के खिलाफ चीन के समक्ष आधिकारिक आपत्ति दर्ज कराई थी।

दुनिया छोटी शक्तियों के साथ अन्याय करती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अन्याय का मुख्य स्रोत शक्तिशाली शक्तियाँ हैं। शक्तिशाली शक्तियों द्वारा सैन्य हस्तक्षेप और नरसंहार के माध्यम से कमजोर शक्तियों के क्षेत्र पर कब्ज़ा करना एक पुरानी अन्यायपूर्ण प्रवृत्ति रही है। न केवल सैन्य बल के प्रयोग से, बल्कि लिखित समझौतों के माध्यम से भी कमजोरों के क्षेत्र पर कब्ज़ा करने के कई उदाहरण हैं।

उदाहरण के लिए, 1938 के म्यूनिख समझौते के तहत, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली ने नाज़ी जर्मनी को तत्कालीन चेकोस्लोवाकिया के सुडेटेनलैंड क्षेत्र पर कब्ज़ा करने की अनुमति दी थी। 1939 के मोलोटोव-रिबेंट्रॉप समझौते के तहत, हिटलर और स्टालिन ने गुप्त प्रोटोकॉल के माध्यम से पोलैंड, बाल्टिक राज्यों और फ़िनलैंड जैसे क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया। 1945 के याल्टा सम्मेलन में, अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ ने पोलैंड, हंगरी, रोमानिया और बुल्गारिया की सहमति के बिना पूर्वी यूरोप में सोवियत प्रभुत्व स्थापित किया। 1945 में हुए पॉट्सडैम समझौते के तहत, पोलैंड की अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ के साथ सीमा पश्चिम की ओर खिसका दी गई थी और जर्मनी से पोलैंड और पोलैंड से सोवियत संघ को भू-भाग हस्तांतरित कर दिया गया था। नेपाल की पड़ोसी सरकारों को इनमें से कुछ अन्यायपूर्ण उदाहरणों से अवगत होना चाहिए। हालाँकि, पड़ोसी देश उपरोक्त उदाहरणों की तरह नेपाल के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार कर रहे हैं।

नेपाल-भारत सीमा विवाद पहले द्विपक्षीय था, लेकिन अब त्रिपक्षीय हो गया है। नेपाल ‘एक चीन’ नीति पर अड़ा हुआ है। हालाँकि, भारत यात्रा के बाद हाल ही में पाकिस्तान पहुँचे चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने गोलमोल जवाब देते हुए कहा है कि भारत-चीन साझेदारी का किसी अन्य देश पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। लेकिन मुख्य मुद्दा भारत-चीन साझेदारी नहीं, बल्कि भारत और चीन द्वारा नेपाली क्षेत्र लिपुलेख पर किया गया समझौता है जो नेपाल की भौगोलिक संप्रभुता को प्रभावित करता है और करता रहा है। चीन, जो हमेशा संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतर्राष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों पर ज़ोर देता है, भारत के साथ ऐसा समझौता कैसे कर सकता है जो नेपाल की संप्रभुता को प्रभावित करता है? यह विडंबना ही है।

कहा जाता है कि नेपाल-भारत सीमा विवाद सुगौली संधि की व्याख्या से उत्पन्न हुआ था, जिसमें ब्रिटिश भारत (अब भारत) के साथ नेपाल की पश्चिमी सीमा को काली (महाकाली) नदी के रूप में परिभाषित किया गया था। सुगौली संधि ने काली नदी को सीमा के रूप में स्थापित किया, लेकिन नदी के उद्गम को निर्दिष्ट नहीं किया। 1996 में नेपाल और भारत के बीच हुए महाकाली नदी समझौते में भी उद्गम का उल्लेख नहीं किया गया था।

नेपाल ‘भौगोलिक जलविभाजक’ के आधार पर महाकाली नदी के उद्गम को लिंपियाधुरा बताता है। यह सबसे मजबूत और अकाट्य भौतिक प्रमाण है। संधि द्वारा स्पष्ट सहमति के अभाव में, महाकाली नदी, जिसका उपयोग नौवहन के लिए नहीं किया जाता है, के उद्गम और मुख्य प्रवाह को सीमा माना जाता है, जो भूगोलवेत्ताओं के अनुसार लिंपियाधुरा में स्थित है। इसके अलावा, सुगौली संधि के बाद प्रकाशित मानचित्र नेपाल के दावे का समर्थन करते प्रतीत होते हैं।

वैकल्पिक साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए, भारत ने 2 नवंबर, 2019 को एक नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया, जिसमें लिंपियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को अपने क्षेत्र में शामिल किया गया। इसके जवाब में, नेपाली सरकार ने 15 मई, 2020 को घोषणा की कि वह लिंपियाधुरा को शामिल करते हुए एक मानचित्र जारी करेगी। नए मानचित्र को 13 जून, 2020 को संविधान में संशोधन करते हुए संसद द्वारा अनुमोदित किया गया। इस मानचित्र को 18 जून, 2020 को राष्ट्राध्यक्ष द्वारा प्रमाणित किया गया।

*चीन-भारत संधि कानून का उल्लंघन*

नेपाल की सहमति के बिना किया गया यह समझौता 1945 के संयुक्त राष्ट्र चार्टर और 1969 के संधि कानून पर वियना कन्वेंशन के विपरीत है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का एक मूलभूत सिद्धांत यह है कि किसी भी देश के क्षेत्र का उसकी सहमति के बिना किसी अन्य देश द्वारा उल्लंघन या कब्जा नहीं किया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना से पहले, शक्तिशाली देश छोटे देशों की सहमति के बिना कानूनी या रणनीतिक निर्णय लेते थे। हालाँकि, चार्टर और वियना कन्वेंशन बिना सहमति के की गई संधियों और समझौतों पर प्रतिबंध लगाते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय संधि कानून का एक सुस्थापित सिद्धांत यह है कि जब दो देश किसी तीसरे देश के भू-भाग से संबंधित संधि करते हैं, तो उस तीसरे देश की सहमति के बिना कोई दायित्व या अधिकार निर्मित नहीं हो सकता। यह सिद्धांत संधियों के कानून पर वियना कन्वेंशन पर आधारित है। इसके अनुसार, संधियाँ केवल उन्हीं पक्षों पर बाध्यकारी होती हैं जिन्होंने उन पर सहमति व्यक्त की हो। अर्थात्, ‘पैक्टा सैंटो सर्वंदा’ नामक इस सिद्धांत का अर्थ है कि संधि के पक्षकार अपने दायित्वों को सद्भावपूर्वक पूरा करने के लिए बाध्य हैं। कोई भी संधि तीसरे देश की स्पष्ट सहमति के बिना दायित्व या अधिकार प्रदान नहीं कर सकती।

ऐसा प्रतीत होता है कि चीन और भारत ने अभी तक नेपाल से औपचारिक रूप से सहमति के लिए संपर्क नहीं किया है। किसी तीसरे देश की सहमति विभिन्न माध्यमों से व्यक्त की जा सकती है, जैसे औपचारिक रूप से संधि में शामिल होना, संधि के प्रावधानों को स्पष्ट रूप से स्वीकार करना। ऐसा प्रतीत होता है कि नेपाल ने ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं अपनाई है। इस संदर्भ में नेपाल की क्षेत्रीय संप्रभुता प्रासंगिक और महत्वपूर्ण है। सहमति से भी संप्रभु भू-भाग का अन्य राज्यों को हस्तांतरण अनुमत नहीं है। लेकिन एक व्यावहारिक समझौता किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, फ़िनलैंड के आलैंड द्वीप समूह की संप्रभुता और वहाँ रहने वाले स्वीडिश लोगों का स्वशासन का अधिकार एक अनूठा उदाहरण है।

*नेपाल के विकल्प*

संयुक्त राष्ट्र चार्टर विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का आदेश देता है और किसी भी राज्य की क्षेत्रीय अखंडता के विरुद्ध बल प्रयोग या धमकी का निषेध करता है। जब दो देश किसी ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर करते हैं जो किसी तीसरे देश के क्षेत्र को प्रभावित करता है, तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ही वह निकाय है जिससे संपर्क किया जाना चाहिए। इस संबंध में नेपाल के लिए मुख्य समस्या यह है कि सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों (चीन, फ़्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका) की सर्वसम्मति के बिना कोई भी प्रस्ताव परिषद में प्रस्तुत या स्वीकृत नहीं किया जा सकता।

नेपाल सुरक्षा परिषद से स्थिति की जाँच करने, पक्षों के बीच मध्यस्थता करने और तीसरे देश के अधिकारों का सम्मान सुनिश्चित करने का अनुरोध कर सकता है। क्या नेपाली सरकार ऐसा करने की इच्छाशक्ति रखती है? यदि नेपाल परिषद से संपर्क करता है, तो क्या पाँच स्थायी सदस्य आवेदन स्वीकार करेंगे? इन दो प्रश्नों का उत्तर देना कठिन है। गाजा नरसंहार और यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के सामने सुरक्षा परिषद स्वयं एक असहाय निकाय बन गई है।

नेपाल के लिए परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों में से एक चीन के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराना अव्यावहारिक होगा। कई विशेषज्ञों का कहना है कि जब नेपाल और भारत के बीच कई द्विपक्षीय मुद्दे अभी तक सुलझ नहीं पाए हैं, तो किसी अन्य विवाद का अंतर्राष्ट्रीयकरण स्थिति को और जटिल बना देगा। ऐसा लगता है कि नेपाल ने मान लिया है कि यह विकल्प व्यावहारिक नहीं है। यदि अन्य कूटनीतिक प्रयास विफल हो जाते हैं, तो नेपाल को अंतिम उपाय के रूप में सुरक्षा परिषद का रुख करना होगा।

यह सर्वविदित है कि कानूनी विवादों को सुलझाने का स्वाभाविक विकल्प अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय है। इस विकल्प का प्रयोग करने के लिए, नेपाल, भारत और चीन को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार करना होगा, लेकिन इनमें से किसी ने भी न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को ‘स्पष्ट रूप से’ स्वीकार नहीं किया है। विशेष रूप से, भारत सीमा संबंधी मुद्दों पर अनिवार्य अधिकार क्षेत्र को स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखता।

नेपाल को संयुक्त राष्ट्र महासभा में त्रिपक्षीय विवाद उठाने से प्रतिबंधित नहीं किया गया है। हालाँकि, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि महासभा नेपाल के सीमा विवाद पर विचार करेगी या नहीं। हालाँकि यह एक अन्य विकल्प है, लेकिन यह विवाद के अंतर्राष्ट्रीयकरण में मदद तो करेगा, लेकिन कोई व्यावहारिक समाधान प्रदान नहीं करता प्रतीत होता है। क्योंकि संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं होते हैं।

इसके अलावा, जुलाई 2025 में नई दिल्ली में आयोजित भारत-नेपाल सीमा कार्य बल की हालिया बैठक में यह निर्णय लिया गया कि दोनों देशों के विदेश सचिव ‘सुस्ता और कालापानी’ के मुद्दे पर विचार करें। भारत सीमा विवाद के द्विपक्षीय समाधान पर ज़ोर देता रहा है। हालाँकि, इसमें देरी करना या कुछ न करना ही भारत का समाधान प्रतीत होता है। नेपाल द्वारा भारत को पूर्व में भेजे गए 8 राजनयिक पत्रों का अनुत्तरित रहना इसका प्रमाण है। पिछली बार नेपाल ने चीन और भारत को अलग-अलग राजनयिक पत्र भेजे थे, लेकिन अब क्या होगा, यह तो समय ही बताएगा।

उपरोक्त विकल्पों के अलावा, मध्यस्थता और तटस्थ न्यायाधिकरण (मध्यस्थता) के विकल्प भी मौजूद हैं। नेपाल और भारत द्वारा विश्वसनीय कोई भी व्यक्ति मध्यस्थ हो सकता है। इसके अतिरिक्त, 1899 से स्थापित एक ‘स्थायी मध्यस्थता न्यायालय’ भी है, जो बाध्यकारी निर्णय दे सकता है। हालाँकि, स्थायी न्यायाधिकरण न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को मामले के पक्षकारों द्वारा एक समझौते के माध्यम से स्वीकार किया जाना चाहिए। नेपाल और भारत एक अलग तटस्थ न्यायाधिकरण पर सहमति व्यक्त करके सीमा विवाद का समाधान कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, भारत-पाक सीमा पर कच्छ के रण पंचाट (1968) ने दोनों देशों के बीच सीमा विवाद का समाधान किया।

भारत और चीन के बीच मध्यस्थता के ज़रिए मौजूदा विवाद को सुलझाने से नेपाल को संभावित रूप से फ़ायदा हो सकता है। लेकिन यह एक जोखिम भरा विकल्प है। क्योंकि कालापानी भू-राजनीतिक रूप से जुड़ा हुआ है, और भारत चीन की भागीदारी को अपने क्षेत्रीय प्रभाव के लिए एक चुनौती के रूप में देख सकता है। भारत कश्मीर पर किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं करता। अगर नेपाल के साथ सीमा पर उसके दावे मज़बूत नहीं हैं, तो भारत मध्यस्थता या कानूनी समझौते में शामिल होने से हिचकिचा सकता है।

हालाँकि नेपाल ने सीमा विवाद को सुलझाने के लिए अतीत में कुछ कूटनीतिक पहल की हैं, लेकिन अभी तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आए हैं। प्रचलित कूटनीतिक सूत्र यही है कि नेपाल अपने पड़ोसियों के साथ द्विपक्षीय संबंध बनाए रखने को प्राथमिकता दे और बातचीत के ज़रिए शांतिपूर्ण समाधान ढूँढे। नेपाल संयुक्त राष्ट्र महासचिव का ध्यान भी अपनी ओर आकर्षित कर सकता है।

अगर वह महासचिव से सार्वजनिक रूप से बातचीत करने का साहस नहीं जुटा पाता, तो वह गुप्त कूटनीति के ज़रिए भी ऐसा कर सकता है। उम्मीद है कि नेपाल के प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री इस मुद्दे पर विचार करेंगे। अगर नेपाल उपरोक्त विकल्पों में से कोई भी विकल्प नहीं अपना पाता, तो भी वह कम से कम चीन और भारत की सरकारों से त्रिपक्षीय बैठक करने का अनुरोध तो कर ही सकता है। अगर वह विकल्प भी व्यावहारिक नहीं हुआ, तो नेपाल सरकार को चीन और भारत से अलग-अलग और गुप्त रूप से बातचीत करने से कोई नहीं रोकेगा। उसके लिए भी कुशल कूटनीति और राजनयिकों की ज़रूरत है।

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  • Ramchandra Rawat

    चीप एडिटर - इंडिया न्यूज़ जक्शन

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