उप सम्पादक जीत बहादुर चौधरी की रिपोर्ट
25/09/2025
काठमाण्डौ,नेपाल — अछाम जिला के ज़्यादातर गाँवों के चौराहों पर एक ही आवाज़ सुनाई देती है, ‘मेरा बेटा इस साल दशईं में आएगा या नहीं?’
इस सवाल के साथ, अछामी माता-पिता और परिवार के सदस्य अपने उन रिश्तेदारों के लौटने का इंतज़ार करने लगते हैं जो रोज़गार के लिए भारत गए हैं।
जैसे-जैसे दशईं नज़दीक आती है, भारत में पसीना बहाने गए लोग घर लौटने लगते हैं और गाँव में आखिरकार रौनक लौट आती है।
अछाम जिला के युवाओं के लिए रोज़गार का मुख्य स्थान भारत है। दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, देहरादून, चंडीगढ़ से लेकर शिमला, दार्जिलिंग और सिलीगुड़ी तक, अछाम जिला के युवा विभिन्न कामों में लगे हुए हैं।
कुछ लोग बड़ी इमारतों, सड़कों और पुलों के निर्माण में दिन भर पसीना बहाते हैं, तो कुछ होटलों और रेस्टोरेंट में बर्तन धोने, रसोइया या वेटर का काम करते हैं।
शहरी इलाकों में दुकानों, अपार्टमेंट और कार्यालय भवनों में सुरक्षा गार्ड की वर्दी में कई नेपाली खड़े दिखाई देते हैं।
इसी तरह, हिमाचल, हरियाणा और पंजाब के खेतों में चावल, गेहूँ से लेकर सब्ज़ी उत्पादन तक, काम करने वाले कृषि मज़दूरों में भी अछामियों की उपस्थिति अनिवार्य है।
ये काम आसान नहीं हैं। उन्हें सुबह से शाम तक धूप में पसीना बहाना पड़ता है, कम मज़दूरी पर कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन यही पसीना दशईं-तिहार (दिपावली)जैसे त्योहारों पर अछामियों के आँगन को रोशन करता है और परिवार में खुशियाँ बिखेरता है।
हिमाचल प्रदेश के शिमला और मनाली में अछाम युवाओं की उपस्थिति ज़्यादा दिखाई देती है, जहाँ वे निर्माण कार्य और होटलों व रेस्टोरेंट में काम करते हैं। दिल्ली और हरियाणा में सुरक्षा गार्डों और निर्माण मज़दूरों की संख्या अच्छी-खासी है। पंजाब में मौसमी खेतीबाड़ी करने वाले अछाम युवाओं का एक बड़ा समूह पाया जाता है।
इसी तरह, मुंबई और बैंगलोर में सेवा क्षेत्र और छोटी-मोटी नौकरियों में उनकी उपस्थिति दिन-ब-दिन बढ़ रही है।
शिमला के एक होटल में काम करने वाले और अब दशईं मनाने के लिए घर लौटे कमलबाजार नगर पालिका-3 के 26 वर्षीय युवराज बिष्ट कहते हैं, “भले ही मैं साल भर भारत में पसीना बहाता हूँ, लेकिन दशईं के लिए घर लौटते ही मैं सारा दर्द भूल जाता हूँ।”
युवराज की तरह, भारत के शहरों और गाँवों में साल भर पसीना बहाने वाले युवा दशईं मनाने के लिए घर लौट रहे हैं।
अछाम जिला के ज़्यादातर परिवार, जो सिर्फ़ खेती से अपनी आजीविका नहीं चलाते, साल भर रोज़गार के लिए भारत जाते हैं। लेकिन वे दशईं, जिसे पारिवारिक सुख और सामाजिक समरसता का प्रतीक माना जाता है, को कभी नहीं छोड़ते।
भारत में होटलों, निर्माण स्थलों, सुरक्षा गार्डों से लेकर मज़दूरी तक, काम करने वाले अछाम दशईं शुरू होने से कुछ हफ़्ते पहले ही अपने गाँव लौटने लगते हैं। घर लौटने की लहर के साथ सड़कों पर यात्रियों की भीड़ बढ़ गई है। बाज़ारों में ख़रीद-फ़रोख़्त का दबाव बढ़ गया है, और गाँवों में लंबे समय बाद मिले रिश्तेदारों के बीच दोस्ताना बातचीत हो रही है। “साल भर चाहे कितना भी गम क्यों न हो, दशईं में घर आए बिना खुशी नहीं मिलती,” ढाकरी ग्रामीण नगर पालिका-7 के भरत नेपाली कहते हैं, जो भारत कमाने गए हैं। “दशईं परिवार से मिलने, प्यार बाँटने और आशीर्वाद लेने का समय होता है। यह घर आने का एक बहाना भी है।”
40 वर्षीय भरत काम के सिलसिले में भारत गए थे। दशईं मनाने के लिए सात साल बाद घर लौटे भरत 15 दिन के लिए यहाँ आए हैं।
उनके साथ उनके गाँव के 60 से ज़्यादा पुरुष भी गाँव लौटे हैं। पहले गाँव पुरुषों से भरा रहता था, जिनमें सिर्फ़ महिलाएँ, बच्चे और बुज़ुर्ग ही होते थे। इस समय वीरान गाँव में चहल-पहल बढ़ गई है।
“अगर एक महीना भी काम न मिले तो घर का खर्च चलाना मुश्किल हो जाता है। मैंने पिछले सालों में भी आने की कोशिश की थी। उस समय पैसे का इंतज़ाम नहीं हो पाया था,”
उन्होंने कहा। “कई सालों बाद, हम भारत में बहाए गए पसीने से त्योहार को सजा पाए हैं।”
अनुमान है कि भारत में पसीना बहाने वाले अछामियों की संख्या लाखों में पहुंचती है। हालांकि, इन सभी दुखों और दूरियों को भुलाने का एक मौका त्योहारों का मौसम होता है। दशईं के करीब आते ही मंगलसेन, संफेबागर से लेकर बायलपाटा, कमलबाजार से पंचदेवल, मुजाबागर तक के बाजारों में यात्रियों की चहल-पहल बढ़ रही है।
अछाम जिला के गांव इस समय भारत से लौटे युवाओं की मौजूदगी से गुलजार हैं। बस पार्किंग, सड़कों पर यात्रियों की भीड़ और बाजारों में खरीदारी ने इसे उत्सवमय बना दिया है। ढाकरी-7 की 60 वर्षीय धनकला नेपाली कहती हैं, ‘बच्चे साल भर बाहर रहते हैं, जब वे दशईं के लिए लौटते हैं, तो घर का आंगन खुशनुमा हो जाता है। ऐसा लगता है कि दशईं तभी आ गई है, जब विदेश में रहने वाले बच्चे आते हैं।







