सीमा संवाददाता जीत बहादुर चौधरी की रिपोर्ट
29/07/2025
काठमाण्डौ,नेपाल – थारू समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला पहला पर्व ‘गुरही’ आज हर्षोल्लास के rसाथ मनाया जा रहा है। कैलाली जिला सहित पूरे थारू समुदाय में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कर यह पर्व मनाया जा रहा है।
थारू समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला गुरही पर्व अपनी एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान रखता है। थारू समुदाय, विशेष रूप से कैलाली जिला कंचनपुर जिला और पश्चिमी नेपाल के अन्य जिलों में रहने वाले लोग, इस पर्व को विशेष महत्व के साथ मनाते हैं।
यह पर्व श्रावण शुक्ल पंचमी अर्थात नाग पंचमी के दिन मनाया जाता है। घोडाघोड़ी नगर भलमंसा कार्यकारिणी समिति के अध्यक्ष बुधराम चौधरी ने बताया कि नाग पंचमी पर विशेष रूप से नेपाली लोग सर्पों की पूजा करते हैं, जबकि थारू समुदाय में ‘गुरही’ की पूजा की जाती है।
उन्होंने बताया कि ऐसी मान्यता है कि गुरही की पूजा करने से घर में जहरीले सांप नहीं आते, घर पर बिजली नहीं गिरती, आग नहीं लगती और महामारी घर में प्रवेश नहीं करती।
इस त्यौहार के अवसर पर विभिन्न कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इस बीच, घोडाघोड़ी नगर भलमंसा कार्यकारिणी समिति गुरही असरैना कार्यक्रम का आयोजन करेगी, नगर भलमंसा कार्यकारिणी समिति के सचिव अमन चौधरी ने बताया।
उनके अनुसार, कार्यक्रम में विभिन्न सांस्कृतिक नृत्य और गीत भी प्रस्तुत किए जाएँगे। कैलाली जिला के स्थानीय स्तर पर गुरही पूजा के अवसर पर सार्वजनिक अवकाश भी घोषित किया गया है।
*गुरही कैसे मनाया जाता है?*
गुरही त्यौहार विशेष रूप से बच्चों से जुड़ा माना जाता है। हाल ही में, सभी आयु वर्ग के लोग इस त्यौहार को मनाते आ रहे हैं। यह त्यौहार नाग पंचमी, यानी श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन मनाया जाता है।
थारू नेता पंचराम चौधरी ने बताया कि ‘गुरही’ एक प्रकार के गाने वाले कीड़े का प्रतीक है, जो पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले कीटाणुओं और मच्छरों को खाता है।
उन्होंने बताया कि इस त्यौहार का नाम गुरही इसलिए पड़ा क्योंकि इसे इस गाने वाले कीड़े के प्रतीक के रूप में कपड़े की गुरही (तितली) बनाकर मनाया जाता है।
त्योहार से कुछ दिन पहले, थारू समुदाय घर-आँगन को कपड़े से साफ़ करता है। त्यौहार के दिन, लोग सुबह स्नान करके शुद्धि करते हैं। महिलाएँ रंग-बिरंगे कपड़े के टुकड़ों से ‘गुरही’ या गुड़िया बनाती हैं। लड़के बाँस या जूट से लकड़ियाँ (कोर्रा) बनाते हैं।
शाम को, गाँव के लोग, खासकर बच्चे और लड़कियाँ, नए कपड़े पहनकर गाँव के चौराहे पर टोकरी, मक्का, केराऊ, चना और कपड़े की गुरही लेकर इकट्ठा होते हैं।
गाँव का मुखिया (भालमंसा) दुबो में गाँठ बाँधकर पूजा शुरू करता है। फिर लड़कियों द्वारा लाई गई गुरही को एक जगह रखकर उसकी पूजा की जाती है।
भाई-बहन के प्रेम के प्रतीक के रूप में मनाए जाने वाले इस त्यौहार में बहनें गुरही फेंकती हैं और भलमंसा के आदेश पर भाई गुरही को लाठियों से पीटते हैं और दोनों पक्ष खुशियाँ मनाते हैं।
गुरही पीटते समय वे ‘घुघरी’ और ‘घुघरी ले लो’ जैसे नारे लगाते हैं। इसे ‘गुरही असरैना’ कहते हैं।
नगर भलमंसा के अध्यक्ष बुधराम चौधरी ने बताया कि मान्यता है कि इस तरह गुरही पीटने से गाँव के रोग और बुरी आत्माएँ भाग जाती हैं।
उनके अनुसार, गुरही पीटने के बाद, लड़की अपने साथ लाए अनाज जैसे भूजा, चना और मक्का सभी को प्रसाद के रूप में बाँटती है।
गुरही पीटने के बाद, वे उसका अंतिम संस्कार किसी नदी या नहर में कर देते हैं। ऐसा माना जाता है कि ऐसा करने से गाँव के रोग और कष्ट पानी के साथ बह जाते हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
कुछ लोग कपड़े के टुकड़े इकट्ठा करके अपने घर के दरवाजे पर बाँधते हैं। नगर भलमंसा चेयरमैन चौधरी ने बताया कि मान्यता है कि ऐसा करने से घर में मौजूद दुख, परेशानियां, सांप-बिच्छू घर से चले जाते हैं।







