उप सम्पादक जीत बहादुर चौधरी की रिपोर्ट
25/10/2025
काठमनण्डौ,नेपाल – सूर्य देव की आराधना कर श्रद्धा और भक्ति के साथ चार दिनों तक मनाया जाने वाला छठ पर्व आज से औपचारिक रूप से शुरू हो गया है।
पहला दिन ‘नहाय-खाय’ है। इस दिन व्रती नदी या तालाब में स्नान करके अरवा-अरबी का भोजन करते हैं।
परिवार की सुख-समृद्धि और संतान की खुशहाली की कामना से मनाए जाने वाले इस पर्व का दूसरा दिन कल (रविवार) है।
कल शाम व्रती चावल, चीनी और दूध से खीर बनाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करेंगे और खरना की रस्म पूरी करेंगे।
तीसरा दिन, सोमवार, छठ का मुख्य दिन है। इस दिन किसी जलाशय के किनारे पूजा सामग्री के साथ डूबते सूर्य को अर्घ्य देने की प्रथा है।
अंतिम दिन, मंगलवार सुबह, उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद, छठ पर्व का औपचारिक समापन होगा। अंतिम दिन को ‘पारण’ कहा जाता है।
छठ पर्व के दौरान बांस की ढाकी, डगरी, मिट्टी के कोसिया-कुरबार, हाथी आदि चढ़ाए जाते हैं। इसी प्रकार, सूर्य देव को प्रसाद के रूप में ठकुवा, भुसुवा, केले, नमकीन, गन्ना, हल्दी, अदरक, सब्जियां, मिठाइयाँ और विभिन्न फल चढ़ाए जाते हैं।
अष्टमी तिथि पर व्रतियों द्वारा 48 घंटे तक अन्न-जल त्याग कर अर्घ्य देने की परंपरा है, इसीलिए छठ को भक्ति और कठोर साधना का पर्व माना जाता है।
चूँकि डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देकर अर्पित की गई वस्तुएँ प्रसाद के रूप में ग्रहण और वितरित की जाती हैं, इसलिए यह पर्व सामाजिक समरसता और एकता का प्रतीक भी माना जाता है।
तराई-मधेश के बाजार इन दिनों पूजा सामग्री की खरीदारी से गुलजार हैं, वहीं नदियों, तालाबों और जलाशयों के घाटों को आकर्षक ढंग से सजाया जा रहा है।
जनकपुर में गंगासागर, धनुषसागर, अंगराजसर और दशरथ ताल जैसे ऐतिहासिक जलाशयों को नवविवाहितों की तरह सजाया जा रहा है। मिथिलाचंल और पूरा तराई-मधेश क्षेत्र अब छठ गीतों की मधुर ध्वनि से गूंज रहा है।







