उप सम्पादक जीत बहादुर चौधरी की रिपोर्ट
17/09/2025
काठमाण्डौ,नेपाल – नेपाल में अंतरिम सरकार के गठन के कुछ ही दिनों बाद, प्रधानमंत्री सुशीला कार्की और नेपाल में भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव के बीच सिंह दरबार में हुई शिष्टाचार भेंट ने एक बार फिर नेपाल-भारत संबंधों और दक्षिण एशियाई भू-राजनीतिक संतुलन को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
बैठक में राजनीतिक परिवर्तन की स्थिति और दोनों पक्षों के बीच आपसी सहयोग के क्षेत्रों पर चर्चाढ हुई।
राजदूत श्रीवास्तव ने भारत सरकार की ओर से नेपाल की लोकतांत्रिक प्रथाओं के प्रति समर्थन व्यक्त किया, जबकि प्रधानमंत्री कार्की ने संतुलित और सम्मानजनक संबंधों की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
*ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और भारत का प्रभाव*
भारत-नेपाल संबंध भौगोलिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से गहरे हैं, लेकिन राजनीतिक प्रभाव के संदर्भ में मूल्यांकन करने पर अक्सर प्रश्न उठते हैं।
*1950 की संधि*: भारत और नेपाल के बीच 1950 की संधि ने खुली सीमा और आपसी सहयोग का मार्ग प्रशस्त किया।
हालाँकि, हाल के दशकों में इस संधि पर भारत के राजनीतिक प्रभाव का आधार बनने का भी आरोप लगाया गया है।
*राजनीतिक परिवर्तन में भूमिका:* 1990 के लोकतांत्रिक आंदोलन से लेकर 2006 के दूसरे जन आंदोलन तक, भारत ने विभिन्न पक्षों की रक्षा करने और उन्हें संवाद एवं आम सहमति तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
*नाकाबंदी (2015)*: नेपाल के नए संविधान की घोषणा के बाद भारत द्वारा लगाई गई नाकाबंदी ने दिखाया कि भारत का दबाव कितना शक्तिशाली हो सकता है। पेट्रोलियम उत्पादों, दवाओं और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित हुई, जिससे नेपालियों का जीवन कठिन हो गया।
*भारत की निगरानी और कूटनीति*
नेपाल में सरकार परिवर्तन, संविधान संशोधन और मधेशी आंदोलन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भारत हमेशा से सक्रिय रहा है। चूँकि भारत दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति है, इसलिए इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
हालाँकि, नेपाल में हाल ही में हुए जनरल-जी आंदोलन में भारत का प्रभाव अपेक्षाकृत कम रहा है।
भारत हमेशा शीर्ष नेताओं के सीधे संपर्क में रहा है और बातचीत और समझौतों में पहल की है।
कुछ मामलों में, इस भूमिका को एक सकारात्मक मध्यस्थ के रूप में देखा जाता है, जबकि अन्य मामलों में, इस पर आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का आरोप लगाया जाता है।
*नेपाल की चुनौतियाँ और कूटनीतिक संतुलन*
नेपाल के लिए मुख्य चुनौती अपने पड़ोसियों के हितों की अनदेखी किए बिना राष्ट्रीय स्वायत्तता बनाए रखना है। चीन के साथ व्यापार मार्ग ने नेपाल को एक वैकल्पिक विकल्प दिया है, लेकिन भारत के साथ भौगोलिक और सांस्कृतिक निकटता अभी भी मज़बूत है।
संवैधानिक संशोधन, आर्थिक नीति और सरकार गठन जैसे निर्णयों में बाहरी दबाव की बजाय लोगों की अपेक्षाएँ और आम सहमति ज़्यादा महत्वपूर्ण होनी चाहिए।
ऐसा लगता है कि सार्क और अन्य क्षेत्रीय तंत्रों को सक्रिय करके साझा समस्याओं पर पड़ोसियों के साथ सहयोग करते हुए आगे बढ़ना ज़रूरी है।
हालाँकि प्रधानमंत्री कार्की और भारतीय राजदूत के बीच हुई मुलाक़ात एक साधारण शिष्टाचार मात्र थी, लेकिन इसने हमें नेपाल-भारत संबंधों की संवेदनशीलता की एक बार फिर याद दिला दी है। नेपाल न तो भारत के साथ अपने संबंधों को बिगाड़ सकता है और न ही बाहरी दबाव को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर सकता है।
अब नेपाल को भारत के साथ सम्मानजनक व्यवहार और पारदर्शी संबंध बनाए रखने होंगे। यह संतुलन नेपाल को राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक विकास और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान दिलाएगा।







