सीमा संवाददाता जीत बहादुर चौधरी की रिपोर्ट
07/08/2025
काठमाण्डौ,नेपाल – दो साल के भीतर अमेरिका-भारत संबंधों में बड़ा बदलाव आया है। विश्व राजनीति में इस पर गहरी नज़र है।
अभी दो साल पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का व्हाइट हाउस में अमेरिका ने भव्य स्वागत किया था। अमेरिकी संसद में उनके भाषण पर तालियाँ बजीं।
तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने मोदी की खुलकर प्रशंसा की थी। इसके पीछे दो रणनीतिक उद्देश्य थे। पहला, अमेरिका चाहता था कि भारत यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के मुद्दे पर अपना स्पष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत करे। दूसरा, भारत को एक ऐसे गठबंधन में शामिल करने की इच्छा थी जो चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला कर सके।
उस पल ने संकेत दिया कि भारत ऐसे हालात में अमेरिका का एक विश्वसनीय साझेदार है जहाँ दुनिया लगातार विभाजित हो रही थी।
लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आगमन के साथ ही अमेरिका और भारत के बीच तनाव बढ़ने के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। क्योंकि ट्रंप ने भारत से आयातित वस्तुओं पर सीमा शुल्क (टैरिफ) बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया है। भारत ने भी अमेरिका के इस फैसले की कड़े शब्दों में आलोचना की है और कहा है कि वह इसका करारा जवाब देगा।
कुछ राजनयिकों का अनुमान है कि यह व्यापार युद्ध अल्पावधि में भारत को नुकसान पहुँचा सकता है। साथ ही, अमेरिका को एक करीबी और महत्वपूर्ण साझेदार खोने की संभावना है। भारत एक ऐसा साझेदार है जो चीन के खिलाफ अमेरिका के लिए उपयोगी हो सकता है।
ट्रंप द्वारा सीमा शुल्क बढ़ाने का फैसला भारत के लिए एक बड़ा झटका है। भारतीय निर्यात संगठनों के महासंघ (FIEO) ने इसे “बेहद आश्चर्यजनक” फैसला बताया है। संगठन ने कहा है कि इस फैसले से अमेरिका को भारत के कुल निर्यात के आधे से ज़्यादा हिस्से पर असर पड़ेगा।
गलवान सीमा क्षेत्र में भारत और चीनी सैनिकों के बीच झड़प के बाद मोदी की पहली चीन यात्रा पर सभी की नज़र है।
दिल्ली स्थित थिंक टैंक ‘ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव’ (GTRI) के अनुसार, अमेरिका को भारत का निर्यात 40 से 50 प्रतिशत तक गिर सकता है।
ऐसे में GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने भारत को संयम बरतने की सलाह दी है। उनका कहना है, ‘भारत को शांत रहना चाहिए। क्योंकि यह समझना ज़रूरी है कि धमकियों या अविश्वास की स्थिति में सार्थक बातचीत नहीं हो सकती।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का असंतोष सिर्फ़ भारत द्वारा रूसी तेल की लगातार ख़रीद के कारण ही नहीं है, बल्कि यूक्रेन में युद्धविराम कराने में उनकी नाकामी के कारण भी है। चुनाव से पहले ट्रंप ने रूस-यूक्रेन युद्ध को 24 घंटे के भीतर रोकने का दावा किया था। सत्ता संभालने के सात महीने बाद भी यह संभव नहीं हो पाया है।
*मोदी की चीन यात्रा में दिलचस्पी*
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की विदेश नीति गहरे रणनीतिक भ्रम में है। बीजिंग में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर हुआंग हुआ का कहना है कि अमेरिका का यह टैरिफ़ हमला दूरदर्शी नहीं है।
उनका कहना है, “अगर अमेरिका टैरिफ़ बढ़ाता है, तो भारत को कुछ नुकसान होगा, लेकिन अमेरिका को ज़्यादा नुकसान होगा, क्योंकि भारत के प्रति ट्रंप की विदेश नीति ग़लत दिशा में जा रही है।”
हुआंग के अनुसार, अमेरिका का यह कदम भारत को चीन की ओर झुका सकता है। उनका अनुमान है कि चीन और भारत मिलकर अमेरिकी दबाव का सामना कर सकते हैं।
इस संदर्भ में, यह याद रखना ज़रूरी है कि भारतीय प्रधानमंत्री मोदी शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन जा रहे हैं। उनकी यह यात्रा 31 अगस्त से 1 सितंबर तक चलने वाली है।
ऐसे में, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का एक ही मंच पर आना अपने आप में एक संदेश होगा। उनका कहना है, ‘चीन और भारत के बीच मज़बूत संबंध बनने चाहिए ताकि अमेरिकी दबाव का सामना किया जा सके।’
*भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग*
गलवान सीमा क्षेत्र में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई झड़प के बाद मोदी की पहली चीन यात्रा पर सभी की नज़र है। इसलिए, उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मोदी की आगामी चीन यात्रा इस लिहाज़ से काफ़ी अहम हो सकती है।
*भारत के लिए कितना बड़ा झटका?*
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका ने भारत के ख़िलाफ़ सख़्त नीति अपनाई है। ब्राज़ील के बाद अब अमेरिका ने भारत पर कुल 50 प्रतिशत टैरिफ़ लगाने का फ़ैसला किया है।
व्हाइट हाउस के अनुसार, अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने का फैसला इसलिए किया है क्योंकि भारत रूस से कच्चा तेल खरीद रहा है।
रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद, भारत द्वारा रूस से आयातित कच्चे तेल की मात्रा में तेज़ी से वृद्धि हुई। 2018 तक, रूस से भारत में आयातित कच्चे तेल का हिस्सा केवल 1.8 प्रतिशत था, लेकिन 2025 तक यह मात्रा 35 प्रतिशत तक पहुँच गई है।
ट्रम्प का मानना है कि भारत रूस से तेल खरीदता जा रहा है, लेकिन रूस को अलग-थलग करने की अमेरिका की कोशिशें कमज़ोर पड़ रही हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध में यूक्रेन का समर्थन करने वाला अमेरिका, रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाता रहा है। समझा जाता है कि अमेरिका ने भारत पर दबाव बढ़ाने के लिए टैरिफ बढ़ाने का फैसला किया है। जबकि अमेरिका रूस से भी कई तरह की वस्तुएँ आयात करता रहा है।
पूर्व भारतीय राजदूत शरद सभरवाल कहते हैं, ‘राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले भी कई देशों के साथ जल्दबाजी में फ़ैसले लिए हैं और बाद में उन्हें पलट दिया है। कई बार उनके बयान सिर्फ़ बातचीत में दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।’
इसलिए, भारतीय विदेश मंत्रालय ने टैरिफ बढ़ाने के अमेरिका के फ़ैसले को ‘अनुचित, अविवेकपूर्ण और निराधार’ बताया है।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने एक बयान में स्पष्ट किया है कि भारत को 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रूस से तेल आयात करना होगा और कहा है कि वह राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा।
*देखो और रुको नीति*
याद रखने वाली बात यह है कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिकी कूटनीति का स्वरूप बदल गया है। इस बार ट्रंप अपनी कूटनीति को व्यापार की ओर मोड़ रहे हैं।
पूर्व भारतीय राजदूत शरद सभरवाल कहते हैं, “राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले भी कई देशों के साथ जल्दबाजी में फैसले लिए हैं और बाद में उन्हें पलट दिया है। कई बार उनके बयानों का इस्तेमाल सिर्फ़ बातचीत में दबाव बनाने के लिए किया जाता है।”
हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप का टैरिफ युद्ध एक वास्तविक नीति है या ट्रंप इसे सौदेबाजी के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अगर रूस युद्धविराम के लिए तैयार हो जाए, तो रिश्ते सामान्य हो सकते हैं। अमेरिका द्वारा रूस को युद्धविराम के लिए दी गई समयसीमा का आज आखिरी दिन है।
इसलिए, पूर्व भारतीय राजनयिक सभरवाल का कहना है कि देखो और रुको नीति अपनाई जानी चाहिए। “हमें इंतज़ार करना होगा और देखना होगा कि क्या ट्रंप वाकई भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाते हैं,” वे कहते हैं।
उनकी राय में, इस मुद्दे पर अमेरिका और भारत के बीच बातचीत की अभी भी संभावना है। वे कहते हैं, “मुझे नहीं पता कि भारत सरकार के पास क्या ठोस विकल्प हैं, लेकिन हमें बातचीत के लिए दरवाज़े खुले रखने होंगे।”
*अमेरिका-पाकिस्तान संबंध भारत के लिए सिरदर्द*
इन सबके बीच, भारत को अमेरिका और पाकिस्तान के बीच बढ़ती नज़दीकियों की चिंता है।
*पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ़*
सबरवाल, जो पाकिस्तान में भारत के पूर्व राजदूत भी हैं, अमेरिका-पाकिस्तान नीति में “लेन-देन-आधारित” संबंधों के पुनरुत्थान को देखते हैं।
उनका विश्लेषण ट्रंप के कथित क्रिप्टो व्यापार और पाकिस्तान में अचानक शुरू हुए तेल अन्वेषण के बीच एक संबंध का सुझाव देता है। हालाँकि, वर्तमान में पाकिस्तान में न तो कोई बड़ा तेल भंडार मिला है और न ही सुरक्षा स्थिति स्थिर है।
सबरवाल कहते हैं, “दरअसल, अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को प्राथमिकता देना भारत पर दबाव बनाने की कोशिश का हिस्सा लगता है। हालाँकि, ऐसा नहीं है कि भारत-अमेरिका संबंध फिर से नहीं सुधर सकते।
वे आगे कहते हैं, “रक्षा, तकनीक, शिक्षा और खुफिया क्षेत्र में भारत और अमेरिका के बीच संस्थागत संबंध अभी भी मज़बूत हैं। लेकिन इस रिश्ते की नींव सम्मान है और अब इसे परखने का समय आ गया है।”







