उप सम्पादक जीत बहादुर चौधरी की रिपोर्ट
17/10/2025
काठमाण्डौ,नेपाल – अंतरिम चुनाव सरकार द्वारा गृह मंत्रालय को पड़ोसी देश भारत के साथ पारस्परिक कानूनी सहायता संधि पर हस्ताक्षर करने की मंज़ूरी दिए जाने के बाद इस मुद्दे पर रुचि और बहस छिड़ गई है।
कुछ लोगों का तर्क है कि चुनाव सरकार को दीर्घकालिक समझौतों पर हस्ताक्षर नहीं करने चाहिए, जबकि अन्य का कहना है कि इस समझौते ने सहकारी संस्था से धोखाधड़ी करने के बाद विदेश में छिपे जी.बी. राई को नेपाल लाकर कार्रवाई करने का रास्ता साफ़ कर दिया है। कुछ लोगों को संदेह है कि भारत के साथ प्रत्यर्पण संधि पर विचार किया जा रहा है।
यह पारस्परिक कानूनी सहायता संधि क्या है? सरकार द्वारा लिया गया निर्णय क्या है? इसके क्या फायदे और नुकसान हैं? आइए जानें।
*पारस्परिक कानूनी सहायता संधि क्या है?*
पारस्परिक कानूनी सहायता संधि दो या दो से अधिक देशों के बीच एक औपचारिक समझौता है, जिसके तहत वे देश आपराधिक अपराधों से संबंधित जाँच, अभियोजन और कानूनी कार्यवाही में एक-दूसरे की सहायता करने के लिए सहमत होते हैं।
सरल शब्दों में, यदि कोई अपराध किसी एक देश में शुरू होता है और किसी अन्य देश से संबंधित है, तो यह संधि दोनों देशों के बीच कानूनी मामलों, जैसे सूचना एकत्र करना, अभियुक्त का पता लगाना, संपत्ति जब्त करना या बयान लेना, में पारस्परिक सहायता प्रदान करती है।
यदि नेपाल और भारत के बीच यह संधि है, तो नेपाल कानूनी रूप से भारत से भारत में रहने वाले किसी व्यक्ति द्वारा नेपाल में किए गए अपराध के साक्ष्य लाने का अनुरोध कर सकता है। इसी प्रकार, नेपाल आपराधिक जाँच में भी भारत को साक्ष्य प्रदान कर सकता है।
इससे धोखाधड़ी, मानव तस्करी, धन शोधन, आतंकवाद और साइबर अपराध तथा आपराधिक कार्यवाही में शामिल लोगों की पहचान और निगरानी करने में मदद मिलती है।
यदि ऐसे अपराधों में शामिल किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करके उसके देश लाया जाना है या भेजा जाना है, तो प्रत्यर्पण संधि की आवश्यकता होती है।
*कैबिनेट बैठक में क्या निर्णय लिया गया?*
गुरुवार को हुई कैबिनेट बैठक के बाद, सरकारी प्रवक्ता और संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री जगदीश खरेल ने कहा कि भारत के साथ पारस्परिक कानूनी सहायता संधि पर समझौते को मंजूरी दे दी गई है।
उन्होंने यह भी बताया कि आवश्यकतानुसार अन्य देशों के साथ आपराधिक मामलों में पारस्परिक कानूनी सहायता संधि के लिए राजनयिक माध्यमों से प्रस्ताव भेजने की मंज़ूरी दे दी गई है।
उन्होंने प्रत्यर्पण का ज़िक्र नहीं किया। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि समझौते के लिए जिस दस्तावेज़ को मंज़ूरी दी गई है, उसमें क्या मुद्दे हैं।
चूँकि यह समझौता द्विपक्षीय होगा, इसलिए नेपाल अकेले समझौते के मुद्दों को तैयार नहीं कर सकता। इसलिए, गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि अभी यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि यह एक प्रत्यर्पण संधि है।
*प्रधानमंत्री कार्यालय का कहना है – वित्तीय अपराधों से संबंधित*
प्रधानमंत्री कार्यालय के एक उच्च पदस्थ अधिकारी ने यह नहीं बताया कि भारत के साथ पारस्परिक कानूनी सहायता पर हुए समझौते में प्रत्यर्पण का मुद्दा शामिल है या नहीं।
उन्होंने कहा, “समझौते की प्रति तैयार होने के बाद ही हमें पता चलेगा।”
लेकिन अधिकारी का कहना है कि वित्तीय अपराधों से जुड़ी सूचनाओं के आदान-प्रदान का मामला है। अधिकारी ने ऑनलाइन न्यूज़ को बताया, “नेपाल भारत में किए गए वित्तीय अपराधों से जुड़े व्यक्तियों के डेटा और सूचनाओं को एक-दूसरे के साथ साझा करने में मदद के लिए पारस्परिक कानूनी सहायता पर एक समझौते पर हस्ताक्षर करने की तैयारी कर रहा है।”
उन्होंने आगे कहा, “ऐसे व्यक्तियों का डेटा साझा करना मुश्किल रहा है जो वित्तीय अपराध करके दुबई और हांगकांग जैसे देशों में गए हैं और फिर नेपाल गए हैं। इसलिए, पहले पड़ोसी भारत के साथ और फिर धीरे-धीरे अन्य देशों के साथ इस समझौते पर हस्ताक्षर करने की तैयारी की जा रही है।”
*चीन के साथ पहला समझौता निष्क्रिय, भारत के साथ तैयारी*
नेपाल ने सबसे पहले 13 अक्टुबर 2019 को चीन के साथ पारस्परिक कानूनी सहायता समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की काठमाण्डौ यात्रा के दौरान हस्ताक्षर किए गए थे। लेकिन यह समझौता वर्तमान में निष्क्रिय है क्योंकि इसे संसद द्वारा पारित नहीं किया गया है।
भारत के साथ हुए समझौते पर भी अमल नहीं हो रहा है। लेकिन दोनों देशों के पुलिस अधिकारी गुप्त रूप से अपराधों में शामिल लोगों को गिरफ्तार करके एक-दूसरे को सौंप रहे हैं, और उनका कहना है कि उन्होंने खुद उन्हें सीमा क्षेत्र से गिरफ्तार किया था।
इसका ताज़ा उदाहरण दुर्गा प्रसाई हैं। 28 मार्च को काठमाण्डौ के तिनकुने में आयोजित राजभक्त आंदोलन के हिंसक हो जाने के बाद भागे प्रसाई को भारत से हिरासत में लिया गया था। हालाँकि, पुलिस ने यह प्रचारित किया था कि उन्हें झापा सीमा से गिरफ़्तार किया गया था।
लेकिन अब नेपाल और भारत एक पारस्परिक सहायता संधि पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर करने की तैयारी कर रहे हैं। इसके लिए, पिछले महीने की 6 और 7 तारीख़ को नई दिल्ली, भारत में आयोजित नेपाल-भारत गृह सचिव स्तरीय बैठक में संधि के मसौदे पर आगे बढ़ने पर सहमति बनी थी।
नेपाल की ओर से तत्कालीन गृह सचिव गोकर्ण मणि दुवादी के नेतृत्व में एक दल ने बैठक में भाग लिया था। उस बैठक में हुए समझौते के अनुसार, गृह मंत्रालय ने संधि प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए इसे मंत्रिपरिषद के पास भेज दिया था।
गुरुवार को मंत्रिपरिषद की बैठक में इसे मंज़ूरी मिलने के बाद, अब यह कार्यान्वयन के चरण में प्रवेश कर गया है। लेकिन भारतीय मंत्रिमंडल द्वारा भी इस पर निर्णय लेने के बाद, दोनों देशों के अधिकारियों के बीच संधि पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर किए जाएँगे।
कुछ लोगों ने पारस्परिक कानूनी सहायता संधि (एमपीटी) को सरकार द्वारा मंज़ूरी दिए जाने पर सवाल उठाए हैं, जिस पर भारत के साथ प्रत्यर्पण और कानूनी सहायता समझौते अंतिम चरण में होने के दौरान हस्ताक्षर किए गए थे।
*इसे संवेदनशील क्यों माना जाता है?*
हालाँकि प्रत्यर्पण संधियाँ कानूनी दृष्टिकोण से अपराध नियंत्रण के लिए उपयोगी होती हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि हर देश सतर्क रहता है क्योंकि राजनीतिक प्रतिशोध और मानवाधिकारों के उल्लंघन की संभावना बनी रहती है।
पूर्व गृह मंत्री जनार्दन शर्मा कहते हैं, “अगर किसी का व्यवहार प्रतिशोधात्मक है और वह दोषी पाया जाता है, तो उसे प्रत्यर्पण संधि के ज़रिए आसानी से वापस लाया जा सकता है। इससे मानवाधिकार और राजनीतिक स्वतंत्रता प्रभावित होती है। चिंता यह है कि पड़ोसी देशों के बीच ऐसी संधियाँ संप्रभुता और कानूनी स्वतंत्रता को कम कर देंगी।”
एक अन्य पूर्व गृह मंत्री भीम रावल ने सवाल उठाया है, “क्या मौजूदा निर्वाचित सरकार दीर्घकालिक समझौते कर सकती है?”







