लखनऊ।
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के संगठनात्मक ढांचे को लेकर जातिगत प्रतिनिधित्व पर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। हाल ही में घोषित जिला अध्यक्षों और प्रमुख पदाधिकारियों की सूची के विश्लेषण से यह तथ्य सामने आया है कि पार्टी संगठन में ऊँची जातियों की भागीदारी जनसंख्या के अनुपात से कहीं अधिक है, जबकि अनुसूचित जातियों और महिलाओं की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत काफी कम बनी हुई है।
सामाजिक अध्ययनों के अनुसार उत्तर प्रदेश की आबादी में पिछड़ा वर्ग (OBC) लगभग 40–45 प्रतिशत, अनुसूचित जाति (SC) करीब 21 प्रतिशत और सामान्य/ऊँची जातियाँ लगभग 18–20 प्रतिशत हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राजनीतिक दल सामाजिक न्याय और समावेशन के सिद्धांतों को अपनाएँ, तो संगठनात्मक पदों में भी इसी अनुपात में प्रतिनिधित्व दिखाई देना चाहिए।
70 जिला अध्यक्षों की सूची से सामने आई तस्वीर
भाजपा द्वारा घोषित 70 जिला अध्यक्षों की सूची के जातिगत विश्लेषण में सामने आया है कि
39 पद ऊँची जातियों के पास हैं, जो लगभग 56 प्रतिशत होता है,
25 पद पिछड़ा वर्ग (OBC) को मिले हैं, यानी लगभग 36 प्रतिशत,
जबकि केवल 6 पद अनुसूचित जाति के हिस्से में आए हैं, जो महज 8 प्रतिशत हैं।
यह स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या हिस्सेदारी की तुलना में काफी कम है, वहीं ऊँची जातियों का दबदबा संगठन में मजबूत बना हुआ है।
महिला प्रतिनिधित्व भी चिंता का विषय
संगठन में महिलाओं की भागीदारी भी सवालों के घेरे में है। जिला अध्यक्षों की सूची में महिलाओं की संख्या करीब 7 प्रतिशत बताई जा रही है, जबकि राज्य की आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत है।
विशेषज्ञों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि संगठनात्मक स्तर पर असंतुलित प्रतिनिधित्व का असर ज़मीनी कार्यकर्ताओं और सामाजिक समर्थन पर पड़ सकता है। हालांकि भाजपा नेतृत्व का कहना रहा है कि नियुक्तियाँ जाति नहीं, बल्कि संगठनात्मक क्षमता, अनुभव और क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखकर की जाती हैं।
अब सबकी निगाहें आगामी मंडल, नगर और बूथ स्तर की नियुक्तियों पर टिकी हैं, जहां यह स्पष्ट होगा कि पार्टी सामाजिक संतुलन साधने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाती है या नहीं।







